Fir kya…

Har shaam , thaki thaki si raahe, ruka ruka sa waqt,
Aur jaise tham si jaati hai jindagi.
Yaadon ko jhakjhor ke dhundh leta hu vo muskurata chehra,
Aur fir,
Fir kya , muskura ke chal padti hai jindagi

Satyam

क्या?

आज कल हवाओं में वो खुशबू नही रही,
तूने वो फूलो का पुराना कारोबार छोड़ दिया क्या?
अब तो वो रास्ते भी तेरे बारे में पूछते हैं मुझसे,
कारोबार तो छोड़ा सही,
तूने वो बागीचे में आना जाना भी छोड़ दिया क्या?

आजकल तेरे ख्वाब भी नही आते मुझे रातों में,
तूने वो ख्वाबों का खरीद फरोख्त छोड़ दिया क्या?
अब तो नींद भी कम ही आने लगी है,
ख्वाबो को छोड़ो,
तूने नींद चुराने का नया काम शुरू कर दिया क्या?

आजकल बेघर सा महसूस कर रहा हूँ मैं,
तूने अपने दिल से मेरी यादों को निकाल दिया क्या?
अब तो वक़्त बेवक़्त हिचकियाँ भी नही आती हैं,
निकाला तो सही,
बेचारी यादों के पास बैठना भी छोड़ दिया क्या?

छोड़ जाने दे सवालो की फेहरिस्त लंबी है मेरी,
बस इतना बता,
वो भी यूँ ही बेवजह तुझे चाहता है क्या?

आईना

इस बार मुझे अपना अक़्स नही दिखा तेरी आँखों में,

वो ख्वाब का आईना तोड़ दिया होगा तूने शायद….

Satyam